गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

lekhan wah chintan ki vyatha gatha

लेखन व चिंतन की व्यथा गाथा
कागज पर कागज कलम पर कलम
करता जा रहा हूँ लेखन वह चिंतन
सब बन गए कूड़े के ढेर
ऐसा है लेखन की दुनिया में अंधेर
क्या कोई है ऐसा इंसान
जो करे सही मायने पर लेखन चिंतन की पहचान
यदि है कोई ऐसा  इंसान 
उसे मैं मानता हूँ भगवान 
नहीं तो सब बेकार है 
लेखन चिंतन नाकाम है 
क्योंकि किसी को नहीं इसकी पहचान है 
दुनिया में इंसान नहीं सब हैवान हैं 
तभी तो इस देश की यह पहचान है 
दुनिया में इस देश की यह पहचान है 
देते हैं सभी दुसरो को दोष 
सही अर्थो में अपनी नहीं पहचान है 
धन्यवाद 
कविताकार अजय पाण्डेय  

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